Tuesday, October 19, 2010
Monday, October 18, 2010
POSTED BY AZIZ BURNEY AT 9:31 AM
ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010ख़ुदा करे कि ये चिंगारी शोला न बने!
अज़ीज़ बर्नी
आज सुबह के अख़बार की इंतिहाई अहम ख़बर रामविलास वैदांति का यह बयान कि ‘‘अयोध्या की सीमाओं में बाबरी मस्जिद स्वीकार नहीं होगी’’ यद्यपि उन्होंने समस्या को बातचीत द्वरा सुलझाने के प्रयासों का स्वागत किया और कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद भी नए सिरे से सुलह सफ़ाई का अभियान प्रशंसा के योग्य है। लेकिन अयोध्या की ‘सांस्कृतिक सीमा’ के भीतर किसी भी तरह की नई मस्जिद संत धर्माचार्यों को स्वीकार नहीं होगी। अर्थात बात करो तो ध्यान में रहे कि उच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी हो, आप एक तिहाई भूमि पर भी मस्जिद के निर्माण की आशा न रखें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस वर्ष हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान संतों के सम्मेलन में स्वीकृत प्रस्ताव में कहा गया था कि पूरी अधिगृहित भूमि (67) एकड़ में श्री राम का भव्य मंदिर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जो प्रस्ताव संत धर्माचार्यों के सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था, संत अब भी उसी पर क़ायम हैं। समझौते के प्रयास भले ही स्वागत योग्य हैं परंतु संतों के प्रस्ताव के आधार पर ही देश में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। यदि मैं केवल एक लेख नहीं लिख रहा होता और न्यायालय में एक वकील के रूप में खड़ा होता तो अत्यंत आदर के साथ कहता ृृच्वपदज जव इम छवजमक डल सवतकश्श् महामहिम यह बात नोट की जाए कि इस प्रस्ताव के आधार पर ही शांति व्यवस्था बनी रहेगी वरना ... क्या होगा आप अनुमान कर सकते हैं कि अब तक क्या होता रहा है।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
और अब मैं आता हूं आज शाम के सबसे प्रमुख समाचार पर। इस समय मेरे सामने लगभग सभी टीवी चैनलों पर शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की लखनऊ प्रेस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे का समाचार चल रहा है। इरादा नहीं था कि आज कोई लेख लिखूं, लेकन इन दोनों घटनाओं ने मजबूर कर दिया कि आज फिर बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व से संबंधित आए 30 सितम्बर 2010 के फ़ैसले पर लिखना चाहिए। यद्यपि इस विषय पर अब बेहतर तो यही है कि जो बात हो वह क़ानून के जानकारों के द्वारा और क़ानून की भाषा में ही हो। परंतु कोई भी घटना जब एक प्रमुख समाचार के रूप में सामने आती है तो एक पत्रकार का यह दायित्व होता है कि उसे संपूर्ण तथ्यों के साथ सामने रखे और यह प्रकाश डालने का भी प्रयास करे कि आख़िर इस ख़ामोश माहौल में तूफ़ान खड़ा करने का प्रयास कौन और क्यों कर रहा है। 30 सितम्बर 2010 को शाम 4 बजे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जज साहिबान के द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद लगभग सभी ऐसे हिंदू संगठनों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए फै़सले का स्वागत किया था, जिनकी ओर से यह आशंका थी कि फ़ैसला अगर उनके पक्ष में नहीं हुआ और उन्हें पसंद नहीं आया तो उनकी ओर से कठोर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। यह वह फ़ैसला था, जिसकी अपेक्षा मुसलमान बिल्कुल नहीं कर रहे थे और क़ानून की जानकारी रखने वाली धर्मनिर्पेक्ष जनता के मन में भी यही था कि जिस बाबरी मस्जिद को शहीद करने के अपराध में आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में मुक़दमा विचाराधीन है, पिछले 18 वर्षों से लिब्राहन आयोग न केवल जांच करता रहा है, बल्कि संसद को अपनी रिपोर्ट भी पेश कर चुका है। कौन-कौन इस अपराध में शामिल नज़र आते हैं, उनके नामों और कारनामों की ओर इशारा भी मीडिया द्वारा सामने आता रहा है। अगर यह सिद्ध होता है कि यह लोग मस्जिद को शहीद करने के लिए ज़िम्मेदार हैं अर्थात बाबरी मस्जिद की इमारत को ध्वस्त कर देना न्यायिक अपराध है तो यह बात अनुमान से परे कैसे हो सकती थी कि कम से कम 6 दिसम्बर 1992 से पूर्व जिन लोगों पर जिस धर्म स्थल को गिरा देने का मुक़दमा चल रहा है उसकी उस हैसियत को स्थापित करना तो न्याय की पहली सूरत होनी चाहिए थी। उसके बाद अन्य मामलों को सामने रख कर न्यायालय क़ानून की रोशनी में जो भी फ़ैसला देता उस पर कोई टिप्पणी होती, उसे स्वीकार किया जाता या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जाता। अगर मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार कर दिया गया तो फिर मस्जिद को शहीद करने वालों के विरुद्ध चलने वाले मुक़दमे तथा लिब्राहन कमीशन के 18 वर्षों के संघर्ष का क्या अर्थ? यह सभी बातें फ़ैसला सामने आने के बाद मन को परेशान करने लगीं। परंतु इस विचार को रद्द करते हुए अविलंब गृहमंत्री पी॰चिदम्बरम का बयान कई बार सामने आया कि इससे न तो कोई अपराध कम होता है और न इस मुक़दमे पर कोई प्रभाव पड़ता है जो बाबरी मस्जिद की शहादत पर चल रहा है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा यह वही बेहतर जानते हैं। हमने इन परिस्थितियों की चर्चा इस समय केवल इसलिए की कि साफ़तौर पर यह देखते हुए भी कि फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं है और न ही क़ानून के मूल्यों पर आधारित है, यह बात हिंदू और मुसलमान सहित क़ानून के जानकार अत्यंत तर्क संगत अंदाज़ में कह रहे हैं, लेकिन मुसलमानों ने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखा और हमने साहस किया और अपने पहले ही लेख के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि जो भी जैसा भी फ़ैसला सामने आया है और जिस संयम तथा धैर्य का प्रदर्शन करते हुए आपने उस पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है कि देश व समाज के बीच कोई नकारात्मक संदेश जाए तो इसदिशा में भी विचार करके देख लीजिए कि अगर उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को जो न तो पूरी तरह आप के पक्ष में है और क़ानूनी बुनियादों पर आधारित, फिर भी देश भर में शांति व एकता की ख़ातिर स्वीकार कर लिया गया और वह स्थान जो मस्जिद के लिए निश्चित किया गया है, उस पर नए सिरे से बाबरी मस्जिद के निर्माण का कार्य शुरू हो जाए और जिस स्थान की घोषणा मंदिर के पक्ष में की गई हैं वहां ख़ुशी से मंदिर का निर्माण किया जाए। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय जाने का दरवाज़ा खुला था। सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की आशा भी की जा सकती है, परंतु जब आप सभी परिस्थितियों को सामने रख कर अतीत और वर्तमान को देखते हुए भविष्य के लिए कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। आज जो बयान सामने आया है राम विलास वैदांति का, यह केवल उनकी निजी सोच और इसे एक संयोग समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत बड़ी भूल कर बैठेंगे। इसी प्रकार शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रेस कान्फ्ऱेंस में लखनऊ में जो घटना पेश आई उसे भी अगर हमने केवल एक संयोग समझा लिया तो यह भी एक बहुत बड़ी भूल होगी। इससे अलग हट कर के 30 सितम्बर के उस फ़ैसले के मामले में शाही इमाम का नज़रिया क्या है? या राजनीतिक दृष्टि से उनका मन क्या है और उनका स्वभाव कितना गर्म है या वह कितने उत्तेजित हो जाते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि प्रश्न करने वाला कौन था? प्रश्न करने वाले का अतीत क्या है? प्रश्न करने वाले की नियत क्या हो सकती है? हमारे सामने उक्त पत्रकार से संबंधित थाना बाज़ार सदर लखनऊ एफआईआर नं॰ 396/08 दिनांक 29 नवम्बर 08 की काॅपी मौजूद है। वह उनकी कार्यप्रणाली और स्वभाव को सामने रखती है लेकिन इस सबके बावजूद जो किया शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी ने न तो उसका समर्थन किया जा सकता है और न उसका बचाव किया जा सकता है। यह ग़लत था अनुचित था। उन्हें इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए था। सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर अत्यंत नम्रता और सभ्य ढंग से देना परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत आवश्यक था और आगे भी आवश्यक है। इसलिए कि नकारात्मक मानसिकता रखने वालों को केवल एक ऐसे अवसर की तलाश है जिसके द्वारा अपने राजनैतिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसा कि अतीत में करते रहे हैं। यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इन साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञों की मानसिकता को समझने में भूल न की होती, उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान न की होती तो आज उनकी जो राजनीतिक हैसियत है, वह संभव नहीं थी। 1951 में हुए प्रथम संसदीय चुनावों से लेकर 1984 में हुए संसदीय चुनावों के पहले तक जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी कभी अपनी ऐसी राजनीतिक स्थिति में नहीं आ सकी कि वह किसी की सरकार बनवा सके या गिरा सके, परंतु 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उनके साथ राजनीतिक गठजोड़ करके मुसलमानों सहित धर्मनिर्पेक्ष वोटों को उनको पक्ष में डलवाने पर न तैयार किया होता तो लाल कृष्ण आडवानी तथा अन्य साम्प्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को केंद्रीय सरकार में वह स्थान नहीं मिलता कि हम आज भी उसका ़ख़मियाज़ा भुगत रहे होते। इतिहास के पन्नों पर दार्ज एक एक पंक्ति को पढ़कर सुनाना इस समय संभव नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम ज़रा यह समझने का प्रयास तो करें कि आख़िर ऐसे सभी आरोप केवल मुसलमानों पर ही क्यांे लगते रहे हैं जिससे देश में अशांति का वातावरण पैदा हो। साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो। क्या हर बार उनकी ही ग़लती होती है या उन्हें साज़िश का शिकार इस चतुरता और योजनाबंदी के द्वारा बनाया जाता है कि वह स्वयं भी अपने आपको अपराधी समझ बैठें। निर्दोष होते हुए भी हंसते हुए हर अपराध को स्वीकार कर लें। देश का विभाजन एक राजनीति थी। मुसलमानों को विभाजित करने के लिए एक लोकतांत्रिक देश में उनके राजनीतिक अस्तित्व को निरर्थक बना देने के लिए यह हुआ और अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ एक ऐसा चेहरा, एक ऐसा व्यक्ति तलाश किया गया जिसके मन में आकांक्षा थी सत्ता पाने की और फिर उसकी इस आकांक्षा को इतना प्रचारित किया गया कि सारी दुनिया जाने कि मुहम्मद अली जिन्नाह ने इस्लाम और मुसमानों के नाम पर अलग देश ले लिया है। इस समय इस संक्षिप्त लेख में विभाजन की पूरी दास्तान को लिखना संभव नहीं है।
इसके बाद दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ और इस दाग़ को मिटाते मिटाते वह महान व्यक्ति (शहीद हेमंत करकरे) स्वयं मिट गया, जो यह सिद्ध कर रहा था, बल्कि बहुत हद तक सिद्ध कर चुका था कि भारत में होने वाली विभिन्न आतंकवादी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार कौन हैं। यह नैटवर्क कितना बड़ा है। इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। उनकी रणनीति क्या है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं। उन्हें प्रशिक्षण कैसे-कैसे लोग देते हैं उनकी योजनाएं क्या हैं। लेखक के पास ऐसा बहुत कुछ है जो इस नैटवर्क का ख़ुलासा करने के लिए काफ़ी है। ऐसा किया भी जाता रहा है और आगे भी किया जा सकता है। परंतु इस समय चर्चा का विषय आतंकवादी घटनाओं का उल्लेख करना नहीं है। हमारे सामने हैं केवल दो समाचार। एक समाचार जो राम विलास वैदांति के बयान पर आधारित है और दूसरा समाचार जो शाही इमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी की प्रैस कान्फ्ऱेंस में हुए हंगामे पर आधारित है। दो अलग अलग बातें हैं, बज़ाहिर उनमें कोई संबंध नहीं है, यह किसी ख़तरनाक योजना का पूर्वाभ्यास हो सकता था या हो सकता है, यह कहना इस समय आसान नहीं है। परंतु क्या अब भी यह समझना बहुत कठिन होगा कि जिन बातों को हम बहुत छोटा समझते हैं वह बाद में कितने बड़े और भयानक परिणाम के रूप में सामने आती हैं। हमारी ज़बान से यह कहलवाना उद्देश्य था और उद्देश्य है कि यह फ़ैसला हमें स्वकार नहीं है ताकि औचित्य प्रदान किया जा सके, ऐसे सभी बयानों का जो राम विलास वैदांति के बयानों के रूप में सामने आ रहे हैं या हिंदू महा सभा के पदाधिकारियों के द्वारा सामने आ चुके हैं। उन्हें प्रतीक्षा है किसी ऐसे बहाने की जिसे आधार बनाकर फिर हालात को तनाव पूर्ण बना सकें और आरोप मुसलमानों पर लगाया जा सके। इसलिए कि अब जनता हिंदू और मुसलमान सभी साम्प्रदायिकता तथा साम्प्रदायवादियों से ऊब गए हैं। वह किसी स्थिति में भी उनको प्रोत्साहित करते नज़र नहीं आते, इसलिए परिस्थितियां सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बन रही हैं और कहीं कोई उत्तेजना नहीं है। इसलिए उन्हें चाहिए कि अब कुछ ऐसे गर्म बयान, ऐसे जोशीले भाषण जिनको बहाना बना कर वह अपने दिल का ग़्ाुबार निकाल सकें, अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना सकंे।
न जाने हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद ही यह क्यों नहीं समझ पाए कि बाबरी मस्जिद के लिए एक तिहाई भूमि का दिया जाना भी उनको स्वीकार नहीं होगा, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में राम के नाम पर राजनीति करके स्वयं को इस हैसियत में लाने में तो सफलता प्राप्त कर ही ली कि कई बार केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने का अवसर मिला। परंतु हर बार दूसरों के सहयोग के सहारे और उनमें वह शामिल थे, जो पूरी तरह उनसे सहमत नहीं थे और उनके साथ मिल कर सरकार चलाने के बावजूद सभी मुद्दों को पीछे डालना मजबूरी थी, जिनपर उनका सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता था, इसलिए इस मानसिकता को दरकार हैं और 20 वर्ष ताकि राम के नाम पर राजनीति को जीवित रख कर, राम मंदिर न बनाकर, राम मंदिर के नाम पर राजनीति कर सकंे, ताकि देश से साम्प्रदायिकता मिटने न पाए, वोटों का बटवारा इसी आधार पर जारी रहे और यह तभी संभव है कि यह समस्या जीवित रहे। अगर वहां मंदिर भी बन गया और मस्जिद भी बन गई तो फिर उस साम्प्रदायिक राजनीति का भविष्य क्या होगा, इसलिए उनकी अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के मद्दे नज़र सर्वोच्च न्यायालय में इस मुक़दमे का जाना आवश्यक था और आवश्यक है। हम उच्च न्यायालय का फ़ैसला स्वीकार करते या न करते, इसलिए कि वह यह भी भलीभांति जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला जो भी आए, योजनाएं उन्हीं की पूरी होंगी, उनके पक्ष में आया तो बाक़ी सब दिल मसोस कर बैठ जाएंगे केवल मुसलमान ही नहीं स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले भी और फ़ैसला अगर उनके विरुद्ध आया तो फिर किस में दम है कि वह इस फ़ैसले को लागू करा सके। आख़िर सरकारों की भी कुछ ज़िम्मेदारी होती है अगर ऐसा नहीं होता तो 24 सितम्बर, 28 सितम्बर और फिर 30 सितम्बर क्यों तारीख़ पर तारीख़ बदलती। क्यों सरकार को चप्पे चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था करने की आवश्यकता पड़ती। बार बार हर स्तर पर यह अपील जारी की जाती कि शांति व्यवस्था बनाए रखें। फ़ैसला जो भी आए सर्वोच्च न्यायालय जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। ज़रा सोचिए सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद किस प्रकार की परिस्थितियंा पैदा हो सकती हैं और क्या फिर उस समय किसी भी सरकार के ज़िम्मेदारों के पास यह कहने का अवसर हो सकता है कि शांति तथा एकता बनाए रखें। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद अब आपके लिए अमुक दरवाज़ा खुला है, आप वहां जा कर अपनी बात कह सकते हैं। शायद उस समय तक पूरी तरह भर चुका सब्र का पैमाना छलक जाए। यदि ऐसा हुआ तो कौन क्या पाएगा, कौन क्या खोएगा, उसे समझना बहुत कठिन भी नहीं है। परंतु हम समझें तो...! अब भी समय है कि हम इन दो छोटी छोटी घटनाओं को ध्यान में रखें जिनको सामने रख कर यह लेख लिखा गया और तय कर लें कि अगर हर दिन ऐसी दरजनों घटनाएं भी सामने आएं भले ही वह किसी षड़यंत्र का हिस्सा हांे या न हों, परंतु हम उससे प्रभावित नहीं होंगे। हम शांति तथा एकता का दामन नहीं छोड़ेंगे। उन्हें संबद्ध लोगों का निजी मामला मान कर बस उन तक ही सीमित रहने देंगे। पूरी क़ौम के साथ उन्हें जोड़ कर चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान देश के हालात को प्रभावित नहीं होने देंगे।
WEDNESDAY, OCTOBER 13, 2010
Monday, October 11, 2010
Communist parties
In the following countries, the Communist parties either lead the ruling coalition or hold monopoly on state power.
China – Communist Party of China leads the United Front
Cyprus – Progressive Party of Working People – leads the ruling coalition
Cuba – Communist Party of Cuba
Laos – Lao People's Revolutionary Party
Nepal – Communist Party of Nepal (Maoist), Communist Party of Nepal (Unified Marxist-Leninist) and Communist Party of Nepal (United) lead the governing coalition. Janamorcha Nepal, and the Communist Party of Nepal (Unity Centre-Masal), are also part of the coalition.
North Korea – Korean Workers' Party – leads the Democratic Front for the Reunification of the Fatherland
Vietnam – Communist Party of Vietnam – leads the Vietnamese Fatherland Front
[edit]Communist parties as part of other ruling coalition
In Cyprus, the ruling Communist party didn't come to power by fommenting a successful revolution, but ratherby being elected to power and thus operate according to the norms of a multi-party system. In Nepal, the ruling Communist parties participate in a multi-party coalition government, an alliance of 22 parties that holds 350 seats in the 601-member constituent assembly. There are also some parties that participate as junior partners in ruling coalitions, as listed below.
Belarus – Communist Party of Belarus – participates in the ruling coalition
Bolivia – Communist Party of Bolivia – participates in the ruling coalition
Brazil – Communist Party of Brazil – participates in the ruling coalition
South Africa – South African Communist Party – participates in the ruling coalition
Sri Lanka – Communist Party of Sri Lanka – participates in the ruling coalition
Syria – Syrian Communist Party (Bakdash), Syrian Communist Party (Faisal) – participates in the ruling coalition
Uruguay – Communist Party of Uruguay – participates in the ruling coalition
Venezuela – Communist Party of Venezuela participates in the ruling coalition
Ukraine – Communist Party of Ukraine participates of ruling coalition
[edit]Formerly ruling
Afghanistan, Democratic Republic of (1978-1992) -People's Democratic Party of Afghanistan
Albania, People's Socialist Republic of (1946-1991) - Albanian Party of Labour
Angola, People's Republic of (1975-1992) - abandoned Marxism-Leninism for social democracy - Popular Movement for the Liberation of Angola
Benin, People's Republic of (1975-1990) - People's Revolutionary Party of Benin
Bulgaria, People's Republic of (1946-1990) - Bulgarian Communist Party (known from 1938 to 1948 as the Bulgarian Workers Party)
Chile (1970-1973) - Communist Party of Chile – participated in the ruling coalition
Czechoslovakia, Socialist Republic of (1948-1990) - Communist Party of Czechoslovakia, Communist Party of Slovakia
Ethiopia, People's Democratic Republic (1974-1991) - Workers' Party of Ethiopia
German Democratic Republic (East Germany) (1949-1990) - Socialist Unity Party of Germany
Hungarian Soviet Republic (1919) - Hungarian Communist Party
Hungarian People's Republic (1949-1989) - Hungarian Working People's Party, Hungarian Socialist Workers' Party
Kampuchea, People's Republic (1979-1993) - Cambodian People's Party
Lithuanian-Belorussian Soviet Socialist Republic (1919) - Communist Party (bolsheviks) of Lithuania and Belorussia
Moldova (2001-2009) – Party of Communists of the Republic of Moldova – lead the ruling coalition
Mongolian People's Republic (1924-1992) - Mongolian People's Revolutionary Party
Mozambique, People's Republic of (1975-1992) abandoned Marxism-Leninism for social democracy - FRELIMO
Poland, People's Republic of (1944-1989) - Polish United Workers Party
Romania, Socialist Republic of (1947-1989) (known as People's Republic of Romania before 1965) - Romanian Communist Party (Romanian Workers Party until 1965)
San Marino (1945-1957) - Sammarinese Communist Party
Soviet Union (1922-1991) - Communist Party of the Soviet Union
Ukrainian SSR (1918) - Communist Party (Bolshevik) of Ukraine, became part of the Russian Communist Party (bolshevik)
Yemen, People's Democratic Republic of (1969-1990) - Yemeni Socialist Party
Yugoslavia, Socialist Federal Republic of (1945-1992) - League of Communists of Yugoslavia
Turkmenistan – Communist Party of Turkmenistan, now renamed Democratic Party of Turkmenistan
[edit]Modern (Non ruling)
Afghanistan - The Khalq faction of the People's Democratic Party of Afghanistan
Albania - Communist Party of Albania
Algeria - Algerian Party for Democracy and Socialism
Argentina - Communist Party of Argentina, Revolutionary Communist Party of Argentina
Armenia - Armenian Communist Party, United Communist Party of Armenia
Australia - Communist Party of Australia, Communist Party of Australia (Marxist-Leninist)
Austria - Communist Party of Austria, Communist Initiative
Azerbaijan - Azerbaijan Communist Party, Reformist Communist Party of Azerbaijan, United Communist Party of Azerbaijan and Azerbaijan Communist Party (on Platform of Marxism-Leninism)
Bahrain - National Liberation Front of Bahrain
Bangladesh - Communist Party of Bangladesh, Workers Party of Bangladesh, Socialist Party of Bangladesh (BASOD)
Belarus - Communist Party of Belarus
Belgium - Kommunistische Partij, Parti Communiste, Workers Party of Belgium
Bhutan - Bhutan Communist Party (Marxist-Leninist-Maoist)
Bosnia and Herzegovina - Workers' Communist Party of Bosnia and Herzegovina
Brazil - Brazilian Communist Party
Bulgaria - Communist Party of Bulgaria
Burma - Communist Party of Burma
Canada - Communist Party of Canada, Communist Party of Quebec, Communist Party of Canada (Marxist-Leninist)
Chile - Communist Party of Chile and Chilean Communist Party (Proletarian Action)
Colombia - Colombian Communist Party, Clandestine Colombian Communist Party
Costa Rica - Popular Vanguard Party, Costa Rican People's Party
Croatia - Socialist Labour Party of Croatia (among other left movements, it represents Croatia's Eurocommunists and New left)
Czech Republic - Communist Party of Bohemia and Moravia
Denmark - Communist Party of Denmark, Communist Party in Denmark, Communist Party
Dominican Republic - Force of the Revolution
Finland - Communist Party of Finland, For Peace and Socialism - Communist Workers Party, League of Communists
France - French Communist Party, Pole of Communist Rebirth in France, Workers Communist Party of France
Ecuador - Communist Party of Ecuador, Marxist-Leninist Communist Party of Ecuador, Workers' Party of Ecuador
Egypt - Egyptian Communist Party
Georgia - Communist Party of Georgia, Georgian United Communist Party, New Communist Party of Georgia
Germany - German Communist Party, Marxist-Leninist Party of Germany, Communist Party of Germany, Communist Platform (Part of Left Party)
Greece - Communist Party of Greece (KKE)
Guadeloupe - Guadeloupe Communist Party
Hungary - Hungarian Communist Workers' Party
India - Communist Party of India, Communist Party of India (Marxist), Socialist Unity Centre of India (Communist), Communist Ghadar Party of India, Communist Party of India (Marxist-Leninist) New Democracy, Communist Party of India (Marxist-Leninist) Liberation, Communist Party of India (Marxist-Leninist) (Kanu Sanyal)
Iran - Tudeh Party of Iran
Iraq - Iraqi Communist Party, Iraqi Communist Party - Cadre, Iraqi Communist Party - Central Command[1]
Ireland - Communist Party of Ireland, Workers' Party of Ireland
Israel - Communist Party of Israel which dominates the Democratic Front for Peace and Equality (Hadash)
Italy - Communist Refoundation Party, Party of Italian Communists, Italian Marxist-Leninist Party
Japan - Japanese Communist Party
Jordan - Communist Party of Jordan, Jordanian Democratic People's Party, Communist Workers' Party of Jordan
Kazakhstan - Communist Party of Kazakhstan, People's Communist Party of Kazakhstan
Kurdistan (autonomous region) - Kurdistan Communist Party, Kurdistan Workers Party - illegal
Kyrgyzstan - Communist Party of Kyrgyzstan, Party of Communists of Kyrgyzstan
Latvia – Socialist Party of Latvia
Lebanon - Lebanese Communist Party
Lesotho - Communist Party of Lesotho
Luxembourg - Communist Party of Luxemburg
Malta - Communist Party of Malta
Martinique - Communist Party of Martinique
Mexico - Popular Socialist Party, Party of Mexican Communists
Moldova – Party of Communists of the Republic of Moldova
Mongolia - Mongolian Communist Party[2]
Montenegro - League of Communists of Yugoslavia - Communists of Montenegro, New Communist Party of Montenegro
Morocco - Annahj Addimocrati
Nagorno-Karabakh (unrecognized country) - Communist Party of Nagorno Karabakh
Netherlands - New Communist Party of the Netherlands
New Zealand - Socialist Party of Aotearoa, Workers Party of New Zealand
Norway - Communist Party of Norway, Red
Palestine - Palestinian People's Party, Popular Front for the Liberation of Palestine
Panama - People's Party of Panama
Paraguay - Paraguayan Communist Party
Pakistan - Communist Mazdoor Kisan Party, Communist Party of Pakistan
Peru - Peruvian Communist Party, Communist Party of Peru (Red Fatherland), Communist Party of Peru, Shining Path
Philippines - Communist Party of the Philippines, Partido Komunista ng Pilipinas-1930
Poland - Communist Party of Poland
Portugal - Portuguese Communist Party, Communist Party of the Portuguese Workers - Reorganizative Movement of the Party of the Proletariat
Quebec - Communist Party of Quebec
Réunion - Communist Party of Réunion
Romania - Asociatia Romania Muncitoare , Comitetul Central de Organizare al Partidului U.C.R (Uniunea Comunistilor Romani)
Russia - Communist Party of the Russian Federation, Communist Workers Party of Russia, All-Union Communist Party Bolsheviks
San Marino - San Marino Communist Refoundation
Serbia - New Communist Party of Yugoslavia, Party of Communists of Serbia, Party of Labour (Serbia)
Senegal - Party of Independence and Labour
Slovakia - Communist Party of Slovakia, Dawn
Spain - Communist Party of Spain, Communist Party of the Peoples of Spain
Sudan - Communist Party of the Sudan
Sweden - Communist Party of Sweden
Switzerland - Swiss Party of Labour
Sri Lanka - Communist Party of Sri Lanka
Taiwan - Communist Party of Taiwan (2008), Communist Party of Republic of China
Tajikistan - Communist Party of Tajikistan
Transnistria (unrecognized country) - Pridnestrovie Communist Party, Communist Party of Pridnestrovie
Turkey - Communist Party of Turkey (TKP), Marxist-Leninist Communist Party
Turkmenistan - Communist Party of Turkmenistan - illegal
Ukraine - Communist Party of Ukraine, Communist Party of Ukraine (renewed), Marxist-Leninist Party of Ukraine
United Kingdom - Communist Party of Britain, Communist Party of Great Britain (Marxist–Leninist) Communist Party of Britain (Marxist-Leninist), Communist Party of Scotland, New Communist Party of Britain, Revolutionary Communist Party of Britain (Marxist-Leninist), Communist League of Great Britain, Revolutionary Communist Group, Spartacist League of Britain
United States - Workers World Party, Freedom Road Socialist Organization, Progressive Labor Party, U.S. Marxist-Leninist Organization, Revolutionary Communist Party, Party for Socialism and Liberation, Communist Party USA, Socialist Workers Party (formerly Trotskyist)
Uzbekistan - Communist Party of Uzbekistan - illegal[3]
[edit]Former
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